मुंबई की विशेष एनआईए अदालत ने बुधवार को मालेगांव बम विस्फोट (Malegaon Bomb Blast 2008) मामले में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे, इसलिए सभी आरोपियों को “संदेह का लाभ” देते हुए मुक्त किया जा रहा है। यह फैसला 18 साल बाद आया है, जिसने पूरे देश में एक बार फिर आतंकवाद और न्याय प्रणाली को लेकर बहस छेड़ दी है।
क्या था मालेगांव विस्फोट मामला?
महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव में 29 सितंबर 2008 को हुए श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों में 6 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। धमाके एक मस्जिद के पास हुए थे, जिससे यह मामला धार्मिक रूप से संवेदनशील बन गया था।
कौन-कौन थे आरोपी?
इस केस में प्रमुख आरोपियों में शामिल थे:
- साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर (वर्तमान में भोपाल से सांसद)
- लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित
- स्वामी दयानंद पांडे, सुनील जोशी (अब मृत), रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर और अन्य।
इन सभी पर UAPA, हत्या, आपराधिक साजिश और विस्फोटक अधिनियम के तहत मामले दर्ज किए गए थे।
कोर्ट ने क्या कहा?
विशेष एनआईए कोर्ट के न्यायाधीश ने कहा कि एनआईए और महाराष्ट्र एटीएस दोनों की जांच में गंभीर खामियां थीं। अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर पाया, और गवाहों के बयान या सबूत घटना को दोषियों से जोड़ने में सक्षम नहीं रहे।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है।
- विपक्ष ने जहां जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाए, वहीं
- साध्वी प्रज्ञा ने फैसले को “सत्यमेव जयते” की जीत बताया।
