प्रमुख बातें

  • केंद्रीय कैबिनेट की आपात बैठक में फ़ैसला; अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की
  • निर्णय पहलागाम आतंकी हमले (25 अप्रैल) के अगले ही दिन लिया गया—हमले में 26 मृत, 10 घायल
  • विदेश सचिव विक्रम मिसरी: “स्थगन तब तक रहेगा, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का समर्थन पूरी तरह नहीं रोकता।”
  • पाकिस्तान ने फ़ैसले को “अवैध व बाध्यकारी संधि का उल्लंघन” बताया; जवाबी कदमों पर विचार
  • विशेषज्ञों का मत: दिल्ली ने “रद्द नहीं, स्थगन” चुनकर कूटनीतिक दबाव बढ़ाया, सैन्य विकल्प खुले

विस्तृत ख़बर

नई दिल्ली | जम्मू‑कश्मीर के पहलगाम में मंगलवार को हुए घातक आतंकी हमले के 24 घंटे के भीतर भारत सरकार ने 1960 की सिंधु जल संधि को “तत्काल प्रभाव से” स्थगित करने का ऐलान कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुलाई गई कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की आपात बैठक में यह निर्णय लिया गया। बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल तथा विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी उपस्थित थे।

बैठक के बाद रात नौ बजे आयोजित प्रेस वार्ता में विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा, “भारत सिंधु जल संधि को तत्काल स्थगित करता है। यह तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक पाकिस्तान अपनी सरज़मीं से संचालित आतंकवाद को स्थायी रूप से ख़त्म नहीं करता।”

पाकिस्तान की प्रतिक्रिया

पाकिस्तान के विदेश मंत्री एवं उप‑प्रधानमंत्री इसहाक़ डार ने लाहौर से पाकिस्तानी मीडिया को बताया कि “भारत संधि को एकतरफ़ा निलंबित नहीं कर सकता। यह विश्व बैंक प्रायोजित बाध्यकारी समझौता है और इस पर क़ानूनी जवाब दिया जाएगा।”

पूर्व पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने डॉन न्यूज़ से कहा कि भारत के पास पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम तथा चिनाब—का पानी रोकने के लिये पर्याप्त ढांचा नहीं है, “पर हमें विश्व बैंक व संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का दरवाज़ा खटखटाना होगा।”

समा टीवी पर एक पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि यदि दिल्ली सैन्य कार्रवाई से परहेज़ करती है तो स्थगन का वास्तविक प्रभाव सीमित रह सकता है।

सैन्य एवं कूटनीतिक विकल्प

ब्रिटिश पत्रिका द इकनॉमिस्ट के डिफेंस एडिटर शशांक जोशी के अनुसार, भारत के पास एयर स्ट्राइक, 2016‑सदृश विशेष बल ऑपरेशन या नियंत्रण रेखा (LoC) पर युद्धविराम समाप्त करने जैसे विकल्प खुले हैं, जबकि मिसाइल प्रहार की संभावना फिलहाल कम है।

द हिंदू की डिप्लोमैटिक अफेयर्स एडिटर सुहासिनी हैदर ने लिखा कि दिल्ली ने “मिशन छोटा करने और वीज़ा रियायतें रोकने” जैसे माध्यमिक उपाय भी चुने हैं, जिससे दबाव बढ़े पर “पुल टूटे नहीं।”